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भारतेंदु युगीन हिंदी साहित्य : एक टिप्पणी

हिंदी साहित्य के आधुनिक काल का प्रारंभ प्रायः भारतेन्दु हरिश्चंद्र (1850–1885) से माना जाता है। उनके नाम पर ही इस युग को ‘भारतेंदु युग’ कहा जाता है। यह काल हिंदी साहित्य में नवजागरण, राष्ट्रीय चेतना और आधुनिक दृष्टिकोण का प्रारंभिक चरण है। इस युग में साहित्य ने मध्यकालीन रूढ़ियों से बाहर निकलकर सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक समस्याओं को विषय बनाया।

भारतेंदु युगीन साहित्य की प्रमुख विशेषता राष्ट्रीय भावना है। अंग्रेज़ी शासन के कारण देश की दयनीय स्थिति और जनता की पीड़ा को साहित्य में स्वर मिला। भारतेंदु ने अपने नाटक भारत दुर्दशा तथा अंधेर नगरी के माध्यम से शासन-व्यवस्था की विसंगतियों और सामाजिक पतन पर तीखा व्यंग्य किया। इस युग के साहित्य में देशप्रेम, स्वदेशी भावना और सामाजिक सुधार की चेतना स्पष्ट दिखाई देती है।

इस काल में हिंदी गद्य का व्यवस्थित विकास हुआ। नाटक, निबंध, उपन्यास, पत्रकारिता और आलोचना जैसी विधाओं की शुरुआत इसी समय हुई। भारतेंदु ने ‘हरिश्चंद्र मैगज़ीन’ और ‘कविवचन सुधा’ जैसी पत्रिकाओं के माध्यम से हिंदी पत्रकारिता को नई दिशा दी। गद्य की भाषा के रूप में खड़ी बोली हिंदी को प्रतिष्ठा मिली, जिससे हिंदी का आधुनिक स्वरूप विकसित हुआ।

भारतेंदु युगीन साहित्य में सामाजिक सुधार की भावना भी प्रमुख थी। बाल-विवाह, दहेज, अंधविश्वास और अशिक्षा जैसी कुरीतियों पर प्रहार किया गया। साहित्य को समाज-परिवर्तन का साधन माना गया। इस काल के अन्य साहित्यकारों—प्रतापनारायण मिश्र, राधाचरण गोस्वामी आदि—ने भी समाज-सुधार और राष्ट्रीय जागरण की भावना को आगे बढ़ाया।

भाषा और शैली की दृष्टि से यह युग संक्रमणकालीन था। ब्रजभाषा और खड़ी बोली दोनों का प्रयोग मिलता है, परंतु धीरे-धीरे खड़ी बोली का वर्चस्व स्थापित हुआ। साहित्य में भावनात्मकता के साथ यथार्थवादी दृष्टि का भी समावेश हुआ।

संक्षेप में, भारतेंदु युग हिंदी साहित्य के नवजागरण का युग है। इसने हिंदी को आधुनिक चेतना, राष्ट्रीय भावना और सामाजिक सरोकारों से जोड़ा। नाटक, पत्रकारिता और गद्य-विकास के क्षेत्र में इस युग का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। अतः भारतेंदु युग को हिंदी साहित्य के आधुनिक विकास की आधारशिला कहा जा सकता है।

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