हिंदी साहित्य के रीतिकाल (लगभग 1700–1900 ई.) में जहाँ एक ओर अलंकार, शृंगार और काव्य-रीति का प्रभाव प्रमुख था, वहीं दूसरी ओर कुछ कवियों ने इस परंपरागत ‘रीति-बद्ध’ शैली से हटकर स्वतंत्र विषय-वस्तु और भावों को अभिव्यक्ति दी। इसी प्रवृत्ति को ‘रीति इतर काव्य’ कहा जाता है। अर्थात् वह काव्य जो रीतिकाल में रचा गया, परंतु जिसमें केवल शास्त्रीय रीति, अलंकार और नायिका-भेद की प्रधानता न होकर सामाजिक, ऐतिहासिक या वीरता संबंधी विषयों का चित्रण हुआ।
रीतिकाल में अधिकांश कवियों ने दरबारी आश्रय में रहकर श्रृंगारिक काव्य की रचना की। परंतु कुछ कवियों ने अपने युग की वास्तविक परिस्थितियों, राष्ट्रभावना, नीति और वीरता को स्वर दिया। इस प्रकार के काव्य में भावों की स्वाभाविकता और विषयों की विविधता मिलती है। यहाँ अलंकारिकता की अपेक्षा ओज, उत्साह और यथार्थ चित्रण को अधिक महत्त्व प्राप्त हुआ।
रीति इतर काव्य की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—
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वीर रस और ओजस्विता का प्राधान्य।
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ऐतिहासिक घटनाओं और व्यक्तित्वों का वर्णन।
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राष्ट्रीय चेतना और स्वाभिमान की भावना।
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भाषा में सरलता तथा भावों की स्पष्टता।
इस धारा के प्रमुख कवियों में भूषण का नाम अत्यंत उल्लेखनीय है। उन्होंने छत्रपति शिवाजी और छत्रसाल जैसे वीरों की प्रशंसा में ओजपूर्ण कवित्तों की रचना की। भूषण के काव्य में वीर रस की तीव्रता और राष्ट्रभावना का स्पष्ट चित्रण मिलता है। उनके अतिरिक्त लाल कवि, पद्माकर आदि कवियों ने भी ऐतिहासिक और वीर विषयों पर काव्य रचा।
रीति इतर काव्य का महत्व इस दृष्टि से विशेष है कि इसने रीतिकाल की एकांगी शृंगारिक प्रवृत्ति को संतुलित किया। जहाँ एक ओर रीतिकाल को ‘शृंगारकाल’ कहा जाता है, वहीं रीति इतर काव्य यह सिद्ध करता है कि उस युग में केवल अलंकारिक प्रेम-वर्णन ही नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र से जुड़े विषय भी अभिव्यक्त हुए। यह काव्य धारा आगे चलकर आधुनिक युग की राष्ट्रीय चेतना के लिए प्रेरणा स्रोत बनी।
निष्कर्षतः, रीति इतर काव्य रीतिकाल का वह महत्वपूर्ण पक्ष है जो शास्त्रीय रीति से हटकर यथार्थ, वीरता और सामाजिक भावनाओं को अभिव्यक्ति देता है। यह धारा हिंदी साहित्य के इतिहास में संतुलन और व्यापकता का परिचायक है तथा रीतिकाल को अधिक समग्र रूप में समझने में सहायक सिद्ध होती है।
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