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Jean Piaget का सिद्धान्त तथा भाषा अधिगम (Language Acquisition)

 

1) भूमिका / प्रस्तावना

भाषा मानव जीवन का अत्यन्त महत्वपूर्ण साधन है। भाषा के माध्यम से ही बालक अपने विचारों को व्यक्त करता है, दूसरों की बात समझता है, ज्ञान प्राप्त करता है तथा समाज से जुड़ता है। बालक का भाषा अधिगम (Language Acquisition) एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, जिसमें वह धीरे-धीरे सुनना, समझना, बोलना, पढ़ना और लिखना सीखता है। बालक का भाषा विकास केवल शब्दों तक सीमित नहीं होता, बल्कि इसमें उच्चारण, शब्दावली, वाक्य रचना, अर्थ ग्रहण, संवाद कौशल तथा भाव अभिव्यक्ति भी शामिल होते हैं।

भाषा अधिगम को समझाने के लिए कई मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त दिए गए हैं, जिनमें स्विस मनोवैज्ञानिक Jean Piaget का संज्ञानात्मक विकास सिद्धान्त विशेष रूप से प्रसिद्ध है। पियाजे के अनुसार भाषा कोई अलग से विकसित होने वाली क्षमता नहीं है, बल्कि यह बालक के संज्ञानात्मक विकास (Cognitive Development) के साथ-साथ विकसित होती है। पियाजे मानते हैं कि बालक पहले अपने अनुभवों द्वारा वस्तुओं और घटनाओं को समझता है, फिर उसी समझ के आधार पर भाषा सीखता है। इसलिए पियाजे का सिद्धान्त भाषा अधिगम को मानसिक विकास से जोड़कर देखने का एक वैज्ञानिक आधार प्रस्तुत करता है।


2) पियाजे का दृष्टिकोण: भाषा और संज्ञान का संबंध

पियाजे के अनुसार बालक निष्क्रिय रूप से ज्ञान ग्रहण नहीं करता, बल्कि वह अपने वातावरण में सक्रिय रहकर ज्ञान का निर्माण करता है। बालक चीजों को देखकर, छूकर, खेलकर, प्रयोग करके तथा अनुभव प्राप्त करके अपने मन में उनके बारे में धारणा बनाता है। इसी धारणा को वह बाद में भाषा के माध्यम से व्यक्त करता है।
अर्थात पियाजे के अनुसार—

  • पहले अनुभव और समझ (Cognition) विकसित होती है,

  • फिर भाषा (Language) उस समझ की अभिव्यक्ति बनती है।

पियाजे का मानना था कि यदि बालक की संज्ञानात्मक संरचना विकसित नहीं हुई है, तो वह भाषा के अर्थ को गहराई से नहीं समझ पाएगा। इसलिए भाषा अधिगम के लिए बच्चे के विचारों (Thoughts) का विकास बहुत आवश्यक है।


3) भाषा अधिगम में पियाजे के प्रमुख सिद्धान्तात्मक तत्वों की भूमिका

(क) स्कीमा (Schema) और भाषा अधिगम

स्कीमा बालक के मन में बनने वाली मानसिक संरचना है, जिसके आधार पर वह वस्तुओं, व्यक्तियों, घटनाओं और अनुभवों को पहचानता तथा समझता है। स्कीमा अनुभवों से बनता है और यही भाषा अधिगम का आधार बनता है।
उदाहरण के लिए, जब बच्चा “गेंद” से खेलता है, उसे उछालता है, पकड़ता है और देखता है, तब उसके मन में “गेंद” का स्कीमा बनता है। बाद में वह उस वस्तु के लिए “गेंद” शब्द सीखता है।
इससे स्पष्ट होता है कि शब्द सीखने से पहले बालक में उस वस्तु की समझ विकसित होती है, और फिर भाषा उस समझ को नाम देती है।

शैक्षिक महत्त्व:
शिक्षक को किसी नए शब्द या अवधारणा को सिखाने से पहले बच्चे को वास्तविक वस्तुओं, चित्रों और गतिविधियों के द्वारा अनुभव कराना चाहिए, ताकि बच्चे के मन में सही स्कीमा बने और भाषा सही ढंग से विकसित हो।


(ख) समावेशन (Assimilation) और शब्दों का सामान्यीकरण

समावेशन वह प्रक्रिया है जिसमें बालक नए अनुभव को अपने पुराने ज्ञान या स्कीमा में जोड़ने का प्रयास करता है। भाषा सीखने के प्रारम्भिक चरण में बच्चे अक्सर यही करते हैं।
उदाहरण के लिए, बच्चा यदि “कुत्ता” शब्द जानता है, तो वह हर चार पैरों वाले जानवर को कुत्ता कह सकता है। क्योंकि वह नए जानवर को पुराने स्कीमा में जोड़कर समझने की कोशिश करता है।
यह प्रक्रिया बच्चों में शब्दों के सामान्यीकरण (Generalization) को दर्शाती है।

शैक्षिक महत्त्व:
जब शिक्षक बच्चों को नए शब्द सिखाते हैं, तो उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि बच्चे प्रारम्भ में शब्दों का गलत प्रयोग कर सकते हैं। शिक्षक को धैर्यपूर्वक सही उदाहरण देकर बच्चे को सही अर्थ तक पहुँचाना चाहिए।


(ग) समायोजन (Accommodation) और सही अर्थ का विकास

जब बालक को यह अनुभव होने लगता है कि पुराना स्कीमा नए अनुभव को समझाने में पर्याप्त नहीं है, तब वह अपने स्कीमा में बदलाव करता है या नया स्कीमा बनाता है। इस प्रक्रिया को समायोजन कहते हैं।
उदाहरण के लिए, बच्चा धीरे-धीरे यह समझता है कि “गाय” और “कुत्ता” अलग-अलग जानवर हैं। तब वह “गाय” के लिए अलग शब्द सीखता है और उसके गुणों को अलग स्कीमा में रखता है।
इस प्रकार समायोजन भाषा के सही अर्थ (Meaning) और शुद्ध शब्द प्रयोग को विकसित करता है।

शैक्षिक महत्त्व:
शिक्षक को बच्चों को नए अनुभव देकर “कुत्ता और गाय में अंतर” जैसे भेद स्पष्ट करने चाहिए, ताकि बच्चे का समायोजन हो और भाषा सटीक बने।


(घ) संतुलन (Equilibration) और भाषा की परिपक्वता

संतुलन का अर्थ है बालक के मन में पुराने ज्ञान और नए ज्ञान के बीच समन्वय स्थापित होना। जब बच्चा किसी नए शब्द या अवधारणा को लेकर भ्रम में होता है, तो उसके मन में असंतुलन होता है। फिर वह सीखने की प्रक्रिया के द्वारा सही अर्थ समझकर मानसिक संतुलन प्राप्त करता है।
यह संतुलन भाषा को परिपक्व बनाता है क्योंकि अब बच्चा शब्दों को सही संदर्भ में प्रयोग करने लगता है।

शैक्षिक महत्त्व:
शिक्षक को बच्चों के अंदर सोचने की चुनौती पैदा करनी चाहिए, जैसे—चित्र दिखाकर पूछना “यह क्या है?” और फिर सही उत्तर तक पहुँचने में मदद करनी चाहिए, ताकि सीखने की प्रक्रिया स्थायी बन सके।


4) पियाजे की संज्ञानात्मक अवस्थाएँ और भाषा अधिगम का विकास

पियाजे के अनुसार भाषा अधिगम बालक की संज्ञानात्मक अवस्थाओं के साथ बढ़ता है। इसलिए प्रत्येक अवस्था में भाषा विकास की प्रकृति अलग होती है।


(1) संवेदी-गतिक अवस्था (0–2 वर्ष) में भाषा अधिगम

इस अवस्था में शिशु भाषा को शब्दों के रूप में नहीं, बल्कि ध्वनि, संकेत और अनुभव के रूप में ग्रहण करता है। वह पहले सुनता है, प्रतिक्रिया देता है और धीरे-धीरे बोलना शुरू करता है।
शिशु की प्रारम्भिक अभिव्यक्ति रोना होता है। रोने के द्वारा वह भूख, दर्द और असुविधा व्यक्त करता है। कुछ महीनों बाद वह कूइंग और बबलिंग जैसी ध्वनियाँ निकालता है। धीरे-धीरे वह इशारे करता है और 1 वर्ष तक आते-आते एक शब्द बोलने लगता है। लगभग 2 वर्ष में वह दो शब्दों के छोटे वाक्य बनाने लगता है, जैसे—“मम्मी पानी”, “खेलना है” आदि।

शिक्षण संकेत:
इस अवस्था में बच्चों से बार-बार बातचीत करना, वस्तुओं के नाम बताना, चित्र दिखाना, गीत सुनाना, प्रतिक्रिया देना और बोलने के लिए प्रेरित करना भाषा विकास के लिए अत्यंत उपयोगी है।


(2) पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था (2–7 वर्ष) में भाषा अधिगम

यह भाषा अधिगम की सबसे तीव्र अवस्था होती है। इस अवस्था में बच्चा शब्दों को तेजी से सीखता है और वाक्य बनाने लगता है। उसकी जिज्ञासा बढ़ जाती है और वह “क्यों”, “कैसे”, “क्या” जैसे प्रश्न अधिक पूछता है।
इस समय बच्चा कल्पनाशील होता है, इसलिए वह कई बार काल्पनिक बातें करता है और स्वयं से भी बोलता रहता है, जिसे निजी भाषण (Egocentric Speech) भी कहा जाता है।
इस अवस्था में बालक भाषा के व्याकरणिक नियमों को धीरे-धीरे सीखता है, लेकिन कई बार वह वाक्य गलत बना सकता है। जैसे वह कह सकता है “मैं गया था” की जगह “मैं गया” आदि।

शिक्षण संकेत:
कहानी सुनाना, कविता, चित्र-वर्णन, बातचीत, रोल-प्ले और भाषा खेल बच्चों की भाषा को बहुत तेजी से बढ़ाते हैं।


(3) ठोस संक्रियात्मक अवस्था (7–11 वर्ष) में भाषा अधिगम

इस अवस्था में बच्चे की भाषा अधिक व्यवस्थित, स्पष्ट और व्याकरणिक हो जाती है। वह अब भाषा का प्रयोग केवल बोलने के लिए नहीं, बल्कि समझने, तर्क करने और लिखने-पढ़ने के लिए भी करता है।
इस उम्र में बच्चे की पठन क्षमता विकसित होती है और वह पाठ समझकर उत्तर देना सीखता है। वह नए शब्दों का अर्थ जानता है, पर्यायवाची-विलोम सीखता है, तथा सरल रचनात्मक लेखन करने लगता है।
अब बच्चा संवाद में नियमों का पालन करता है, दूसरों की बात सुनता है और उचित उत्तर देता है।

शिक्षण संकेत:
इस अवस्था में पठन अभ्यास, श्रुतिलेख, निबंध, पत्र लेखन, अनुच्छेद लेखन, प्रश्नोत्तर तथा पुस्तकालय गतिविधियाँ भाषा को मजबूत करती हैं।


(4) औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था (11 वर्ष से ऊपर) में भाषा अधिगम

इस अवस्था में किशोर अमूर्त चिंतन कर सकता है और भाषा का प्रयोग उच्च स्तर पर करता है। वह नैतिकता, न्याय, समाज, देश, स्वतंत्रता जैसे विचारों पर चर्चा कर सकता है और अपनी राय तर्कपूर्वक प्रस्तुत करता है।
किशोर अब निबंध, भाषण, वाद-विवाद, रिपोर्ट लेखन, समीक्षा लेखन तथा साहित्यिक भाषा के प्रयोग में अधिक सक्षम हो जाता है।
इस अवस्था में शब्द चयन, वाक्य शैली तथा अभिव्यक्ति में परिपक्वता आ जाती है।

शिक्षण संकेत:
वाद-विवाद, समूह चर्चा, भाषण, लेख लेखन, पुस्तक समीक्षा, प्रोजेक्ट रिपोर्ट और प्रस्तुतियाँ भाषा विकास में अत्यंत लाभकारी होती हैं।


5) पियाजे के सिद्धान्त का भाषा शिक्षण में शैक्षिक महत्त्व

पियाजे का सिद्धान्त भाषा शिक्षण को कई महत्वपूर्ण आधार देता है। यह सिद्धान्त बताता है कि भाषा सिखाने के लिए बच्चे को अनुभव, क्रिया और सक्रिय सहभागिता देना आवश्यक है। शिक्षक को शब्द रटाने की बजाय अर्थ समझाकर और गतिविधि करवाकर भाषा सिखानी चाहिए। शिक्षक को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अलग-अलग बच्चों की सीखने की गति अलग होती है, इसलिए विकास के अनुसार भाषा शिक्षण की योजना बनानी चाहिए। इसके साथ ही बच्चों की गलतियों को सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा मानना चाहिए और उन्हें सुधार के अवसर देने चाहिए।


6) पियाजे के सिद्धान्त की सीमाएँ (भाषा अधिगम के संदर्भ में)

भाषा अधिगम के संदर्भ में पियाजे के सिद्धान्त की कुछ सीमाएँ भी हैं। पियाजे ने भाषा को संज्ञानात्मक विकास का परिणाम माना, पर कई विद्वानों के अनुसार भाषा सामाजिक सहभागिता से भी तेज विकसित होती है। पियाजे ने भाषा विकास में समाज और संस्कृति की भूमिका को कम महत्व दिया, जबकि वास्तव में भाषा सामाजिक संपर्क से अधिक विकसित होती है। वाइगोत्स्की जैसे मनोवैज्ञानिकों ने यह बताया कि भाषा विकास में सामाजिक बातचीत और मार्गदर्शन की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण है।


निष्कर्ष / उपसंहार

अतः यह कहा जा सकता है कि Jean Piaget का सिद्धान्त भाषा अधिगम को समझने के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करता है। पियाजे के अनुसार भाषा विकास बालक के संज्ञानात्मक विकास से जुड़ा होता है और बच्चा अपने अनुभवों तथा पर्यावरण से अंतःक्रिया करके ज्ञान का निर्माण करता है, जिसे वह भाषा के माध्यम से व्यक्त करता है। इसलिए भाषा शिक्षण में शिक्षक को बालक की विकास अवस्था, अनुभव, गतिविधि आधारित शिक्षण और सही मार्गदर्शन का विशेष ध्यान रखना चाहिए। इसी से भाषा अधिगम प्रभावी, स्थायी और सार्थक बनता है।

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