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विविध अवस्थाओं में भाषा के विकास को स्पष्ट कीजिए


भूमिका / प्रस्तावना

भाषा मानव जीवन का सबसे महत्वपूर्ण साधन है। भाषा के द्वारा ही मनुष्य विचारों का आदान-प्रदान, भावनाओं की अभिव्यक्ति, ज्ञान का ग्रहण, तथा सामाजिक संबंधों का निर्माण करता है। बालक के समग्र विकास में भाषा विकास का विशेष स्थान है, क्योंकि भाषा के बिना सीखना, समझना, व्यक्तित्व निर्माण और सामाजिक व्यवहार संभव नहीं है।

भाषा विकास का अर्थ केवल बोलना नहीं होता, बल्कि इसमें सुनना (Listening), बोलना (Speaking), पढ़ना (Reading), लिखना (Writing) तथा समझना (Understanding) सम्मिलित है। भाषा का विकास जन्म से ही आरम्भ हो जाता है और धीरे-धीरे विभिन्न अवस्थाओं में पूर्णता की ओर बढ़ता है।

भाषा विकास में परिवार, सामाजिक वातावरण, विद्यालय, शिक्षक, मित्र समूह, अभ्यास, प्रेरणा और संस्कृति की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। नीचे विभिन्न अवस्थाओं के अनुसार भाषा विकास को विस्तार से समझाया गया है।


1) शैशवावस्था (0–2 वर्ष) में भाषा विकास

शैशवावस्था भाषा विकास की प्रारम्भिक और आधारभूत अवस्था है। इस समय बच्चा बोलना नहीं जानता, परन्तु वह आवाजों और संकेतों को पहचानने लगता है। इस अवस्था में बच्चा ध्वनियों को सुनकर प्रतिक्रिया देना सीखता है और धीरे-धीरे बोलने के लिए तैयार होता है।

(A) भाषा विकास की विशेषताएँ

1. रोना (Crying) – जन्म से

  • रोना शिशु की पहली अभिव्यक्ति होती है।

  • भूख, दर्द, डर, असुविधा आदि को बच्चा रोकर व्यक्त करता है।

2. कूइंग/गुनगुनाहट (Cooing) – 2 से 4 माह

  • बच्चा “आ-आ”, “ऊ-ऊ”, “ए-ए” जैसी ध्वनियाँ निकालता है।

  • यह आवाजें प्रसन्नता या ध्यान आकर्षित करने के लिए होती हैं।

3. बबलिंग (Babbling) – 6 से 10 माह

  • बच्चा “बा- बा”, “मा-मा”, “दा-दा” जैसी ध्वनियाँ बार-बार दोहराता है।

  • यह चरण बोलने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।

4. संकेत भाषा (Gestures) – 9 से 12 माह

  • बच्चा इशारों से चीज़ें मांगना, मना करना, बुलाना सीखता है।

5. एक शब्द अवस्था (One Word Stage) – 12 से 18 माह

  • बच्चा केवल एक शब्द बोलकर पूरा अर्थ बताता है, जैसे—

    • “पानी” (मुझे पानी चाहिए)

    • “मम्मी” (मम्मी पास आओ)

6. दो शब्द अवस्था (Two Word Stage) – 18 से 24 माह

  • बच्चा दो शब्द जोड़कर बोलता है, जैसे—

    • “मम्मी आओ”

    • “दूध दो”

    • “गाड़ी चल”

(B) शिक्षणात्मक महत्त्व

  • इस अवस्था में बच्चे से स्पष्ट, प्यार भरी भाषा में बात करनी चाहिए।

  • बच्चे की हर कोशिश को प्रोत्साहन देना चाहिए।

  • चित्र, खिलौने, रंगीन किताबें, आवाज वाले खेल, कविता व लोरी से भाषा बढ़ती है।

  • बच्चे को डराकर या डाँटकर चुप कराने से भाषा विकास प्रभावित हो सकता है।


2) प्रारम्भिक बाल्यावस्था (2–6 वर्ष) में भाषा विकास

यह अवस्था भाषा सीखने की सबसे तीव्र और सक्रिय अवस्था है। इस समय बालक तेजी से नए शब्द सीखता है और वाक्य बनाना शुरू करता है। बच्चा बहुत जिज्ञासु होता है, इसलिए “क्यों, कैसे, क्या” जैसे प्रश्न अधिक पूछता है।

(A) भाषा विकास की विशेषताएँ

1. शब्द भंडार में तीव्र वृद्धि

  • 2 से 6 वर्ष तक बच्चा हजारों शब्द सीख सकता है।

  • रोज नए शब्द सुनकर उनका अर्थ समझने लगता है।

2. वाक्य निर्माण का विकास

  • 2–3 वर्ष: 2 से 3 शब्दों वाले वाक्य

  • 4–5 वर्ष: 4 से 6 शब्दों वाले वाक्य

  • 5–6 वर्ष: सरल और स्पष्ट वाक्य

3. व्याकरणिक नियमों की शुरुआत

  • बच्चा “मैं गया”, “मैं खाया” जैसे वाक्य बोलना सीखता है।

  • कई बार गलतियाँ करता है, पर यही सीखने की प्रक्रिया है।

4. कल्पना एवं कहानी निर्माण

  • बच्चा अपनी कल्पना से बातों को जोड़कर कहानियाँ बनाता है।

  • यह भाषा की रचनात्मकता को बढ़ाता है।

5. गलत उच्चारण (Pronunciation Errors)

  • कई बच्चे “स्कूल” को “कूल”, “ट्रेन” को “टेन” बोल सकते हैं।

  • धीरे-धीरे अभ्यास से उच्चारण सुधरता है।

(B) शिक्षणात्मक महत्त्व

  • इस उम्र में खेल आधारित भाषा शिक्षण सर्वश्रेष्ठ है।

  • बच्चे को कहानी सुनाना, चित्रों का वर्णन, रोल-प्ले, कविता पाठ कराना चाहिए।

  • बच्चों की गलत भाषा पर हँसना/डाँटना नहीं, बल्कि सही शब्द दोहराकर सिखाना चाहिए।

  • बोलने के अवसर ज्यादा देने से भाषा तेज विकसित होती है।


3) उत्तर बाल्यावस्था / विद्यालयी अवस्था (6–12 वर्ष) में भाषा विकास

यह अवस्था औपचारिक शिक्षा की अवस्था होती है। इस समय बच्चे के भाषा विकास का क्षेत्र व्यापक हो जाता है और भाषा के चारों कौशल (LSRW) मजबूत होते हैं।

(A) भाषा विकास की विशेषताएँ

1. सुनना (Listening) में सुधार

  • बच्चा निर्देशों को समझने लगता है।

  • शिक्षक की बात ध्यान से सुनकर कार्य कर सकता है।

2. बोलना (Speaking) में स्पष्टता

  • बालक शुद्ध शब्दों का प्रयोग सीखता है।

  • आत्मविश्वास से जवाब देने लगता है।

3. पढ़ने का विकास (Reading)

  • अक्षर ज्ञान से शब्द, वाक्य, अनुच्छेद पढ़ता है।

  • पठन गति और समझ बढ़ती है।

  • कहानी व पाठ समझकर प्रश्नों का उत्तर देने लगता है।

4. लिखने का विकास (Writing)

  • लिखावट सुधरती है।

  • वर्तनी, विराम-चिह्न, वाक्य संरचना बेहतर होती है।

  • बालक अनुच्छेद, पत्र, आवेदन, निबंध लिखने लगता है।

5. शब्दावली और अर्थ ग्रहण

  • पर्यायवाची, विलोम, मुहावरे, लोकोक्तियाँ सीखता है।

(B) शिक्षणात्मक महत्त्व

  • शिक्षक को नियमित पठन-अभ्यास, जोर से पढ़ना, मौन पठन, श्रुतिलेख कराना चाहिए।

  • शब्द-दीवार (Word Wall), शब्द खेल, प्रश्नोत्तर, नाटक, कविता पाठ उपयोगी है।

  • बच्चों में बोलने का डर दूर करने के लिए सकारात्मक वातावरण देना चाहिए।


4) किशोरावस्था (12–18 वर्ष) में भाषा विकास

यह अवस्था भाषा को परिष्कृत करने की अवस्था है। किशोरों में भाषा के साथ-साथ विचार और तर्क शक्ति का भी विकास होता है। वे गहरी बातों को समझने और व्यक्त करने लगते हैं।

(A) भाषा विकास की विशेषताएँ

1. तार्किक और आलोचनात्मक सोच

  • किशोर किसी विषय पर तर्क देकर अपनी बात रखता है।

  • चर्चा और बहस में रुचि बढ़ती है।

2. साहित्यिक समझ

  • कविता, कहानी, नाटक, लेख, जीवनी पढ़ने में रुचि।

  • भावार्थ, सार, संदेश समझने लगता है।

3. औपचारिक भाषा का विकास

  • भाषण, निबंध, रिपोर्ट, लेखन में सुधार।

  • भाषा में शुद्धता और प्रभाव बढ़ता है।

4. भावनात्मक अभिव्यक्ति

  • किशोर अपनी भावनाएँ शब्दों में बेहतर व्यक्त करने लगता है।

(B) शिक्षणात्मक महत्त्व

  • वाद-विवाद, भाषण, समूह चर्चा, पुस्तक समीक्षा, नाटक आदि कराना चाहिए।

  • सही मार्गदर्शन से किशोरों की भाषा आत्मविश्वासी और प्रभावी बनती है।

  • आलोचना से बचकर प्रोत्साहन व प्रेरणा देना चाहिए।


5) युवावस्था (18+ वर्ष) में भाषा विकास

युवावस्था में भाषा लगभग पूर्ण विकसित होती है। इस समय भाषा का प्रयोग शैक्षिक, सामाजिक और व्यावसायिक जीवन में अधिक प्रभावी रूप से होता है।

(A) भाषा विकास की विशेषताएँ

  • व्यक्ति संप्रेषण में स्पष्ट और प्रभावी होता है।

  • व्यावसायिक भाषा जैसे इंटरव्यू, प्रस्तुतीकरण, रिपोर्ट लेखन में कुशल बनता है।

  • तर्क और विश्लेषण के साथ लिखना/बोलना सीखता है।

(B) शिक्षणात्मक महत्त्व

  • उच्च शिक्षा में शोध लेखन, संवाद कौशल, प्रस्तुतीकरण और प्रोफेशनल भाषा पर ध्यान आवश्यक है।


भाषा विकास को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक

  1. परिवार का वातावरण और बातचीत

  2. विद्यालय, शिक्षक और शिक्षण विधियाँ

  3. मित्र समूह और सामाजिक संपर्क

  4. श्रवण क्षमता, स्वास्थ्य और मानसिक स्थिति

  5. अभ्यास, अवसर और प्रेरणा

  6. पुस्तकें, मीडिया और भाषा संसाधन

  7. संस्कृति और मातृभाषा का प्रभाव


निष्कर्ष / उपसंहार

इस प्रकार भाषा विकास एक क्रमिक, निरन्तर और बहुआयामी प्रक्रिया है, जो जन्म से शुरू होकर युवावस्था तक परिपक्व होती जाती है। शैशवावस्था में ध्वनियाँ और संकेत, बाल्यावस्था में शब्द और वाक्य, विद्यालयी अवस्था में पढ़ना-लिखना, किशोरावस्था में तार्किक एवं रचनात्मक भाषा और युवावस्था में प्रभावी व व्यावसायिक भाषा विकसित होती है।

यदि बालक को घर और विद्यालय में अनुकूल वातावरण, पर्याप्त अवसर, सकारात्मक प्रोत्साहन और सही मार्गदर्शन मिले, तो उसका भाषा विकास सफल, समृद्ध और प्रभावी बनता है।

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