भूमिका / प्रस्तावना
बालक का संज्ञानात्मक विकास जन्म से शुरू होकर धीरे-धीरे विभिन्न अवस्थाओं में परिपक्व होता जाता है। शिक्षक यदि विकास की अवस्था के अनुसार शिक्षण करे तो अधिगम सरल, स्थायी और प्रभावी बनता है।
संज्ञानात्मक विकास की प्रमुख अवस्थाएँ (Piaget के अनुसार)
मनोवैज्ञानिक जीन पियाजे (Jean Piaget) के अनुसार संज्ञानात्मक विकास चार चरणों में होता है—
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संवेदी-गतिक अवस्था (0–2 वर्ष)
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पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था (2–7 वर्ष)
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ठोस संक्रियात्मक अवस्था (7–11 वर्ष)
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औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था (11 वर्ष से आगे)
इन्हीं के आधार पर हम विकास की विभिन्न अवस्थाओं में संज्ञानात्मक विकास स्पष्ट करते हैं—
1) शैशवावस्था (0–2 वर्ष) में संज्ञानात्मक विकास
यह अवस्था संवेदी-गतिक (Sensory-Motor) कहलाती है। इस समय बालक सीखता है देखकर, सुनकर, छूकर और क्रिया करके। बालक वस्तुओं को पकड़ता है, खेलता है, और अनुभव करता है।
प्रमुख विशेषताएँ
1. इन्द्रिय अनुभव और क्रिया से सीखना
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बच्चा अपने आस-पास की दुनिया को इन्द्रियों से पहचानता है।
2. वस्तु स्थायित्व (Object Permanence)
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शुरुआत में बच्चा सोचता है कि वस्तु दिख नहीं रही तो वह है ही नहीं।
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धीरे-धीरे 8–12 माह के बाद समझता है कि वस्तु आँखों से ओझल होने पर भी मौजूद रहती है।
3. कारण-परिणाम समझ (Cause–Effect)
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बच्चा सीखता है कि
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बटन दबाने से खिलौना बजता है
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रोने से माँ आती है
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4. अनुकरण (Imitation)
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बच्चा दूसरों की क्रियाएँ देखकर नकल करता है।
5. प्रारम्भिक स्मृति (Memory) का विकास
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परिचित चेहरे, आवाजें पहचानने लगता है।
शिक्षणात्मक महत्त्व
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इस अवस्था में शिक्षण “कक्षा” में नहीं बल्कि घर और देखभाल के माध्यम से होता है।
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बच्चे को रंगीन वस्तुएँ, आवाज वाले खिलौने, चित्र, गीत देना उपयोगी है।
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प्यार, सुरक्षा और बातचीत संज्ञानात्मक विकास की मजबूत नींव बनाते हैं।
2) प्रारम्भिक बाल्यावस्था (2–6 वर्ष) में संज्ञानात्मक विकास
यह अवस्था पियाजे के अनुसार पूर्व-संक्रियात्मक (Pre-operational) मानी जाती है। इस समय बालक में भाषा, कल्पना और प्रतीकात्मक सोच विकसित होती है।
प्रमुख विशेषताएँ
1. प्रतीकात्मक सोच (Symbolic Thinking)
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बच्चा वस्तु की जगह प्रतीक प्रयोग करता है।जैसे— डंडे को तलवार बनाकर खेलना।
2. कल्पना शक्ति का तीव्र विकास
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बच्चा काल्पनिक बातें करता है, कहानी बनाता है।
3. आत्मकेन्द्रित सोच (Egocentrism)
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बच्चा सोचता है कि जैसे वह देखता है वैसे ही दूसरे भी देखते हैं।
4. एक ही बात पर ध्यान (Centration)
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बच्चा किसी वस्तु के केवल एक गुण पर ध्यान देता है।जैसे— लंबा गिलास देखकर सोचता है पानी ज्यादा है, जबकि मात्रा समान होती है।
5. संरक्षण (Conservation) का अभाव
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बच्चा आकार बदलने से मात्रा बदल गई ऐसा मानता है।
6. “क्यों-कैसे” वाले प्रश्न
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बच्चा बहुत जिज्ञासु होता है और लगातार प्रश्न पूछता है।
शिक्षणात्मक महत्त्व
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इस अवस्था में खेल विधि (Play-way), कहानी, चित्र, रोल-प्ले सबसे असरदार हैं।
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बालक को ठोस अनुभव दें, क्योंकि तर्क क्षमता अभी सीमित होती है।
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छोटे-छोटे कार्य, गतिविधि आधारित सीखना श्रेष्ठ रहता है।
3) उत्तर बाल्यावस्था (6–12 वर्ष) में संज्ञानात्मक विकास
यह अवस्था पियाजे के अनुसार ठोस संक्रियात्मक (Concrete Operational) होती है। इस समय बच्चा तर्क करना सीखता है, लेकिन तर्क “ठोस वस्तुओं” पर आधारित होता है।
प्रमुख विशेषताएँ
1. संरक्षण का विकास (Conservation)
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बच्चा समझने लगता है कि आकार बदलने से मात्रा नहीं बदलती।जैसे— पानी, मिट्टी, सिक्के आदि के प्रयोगों से समझता है।
2. वर्गीकरण (Classification)
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चीजों को समूह में बाँटना सीखता है।जैसे— रंग के अनुसार, आकार के अनुसार, जानवर/पक्षी अलग-अलग।
3. श्रेणीकरण (Seriation)
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वस्तुओं को क्रम में लगाना सीखता है।जैसे— छोटा-बड़ा, हल्का-भारी, कम-ज्यादा।
4. तर्क और कारण (Logical Reasoning)
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बच्चा कारण बताकर उत्तर देना सीखता है।
5. समस्या समाधान (Problem Solving)
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गणित की पहेलियाँ, जोड़-घटाव, तुलना, अनुमान लगाने की क्षमता बढ़ती है।
6. स्मृति और ध्यान में सुधार
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याद रखने और ध्यान लगाने की शक्ति बढ़ती है।
शिक्षणात्मक महत्त्व
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शिक्षक को TLM, प्रयोग, गतिविधियाँ, मॉडल, चार्ट का प्रयोग करना चाहिए।
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यह अवस्था गणित और विज्ञान के आधार बनाने की है।
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समूहकार्य, परियोजना, अभ्यास और पुनरावृत्ति से सीखना मजबूत होता है।
4) किशोरावस्था (12–18 वर्ष) में संज्ञानात्मक विकास
यह अवस्था पियाजे के अनुसार औपचारिक संक्रियात्मक (Formal Operational) होती है। अब बालक अमूर्त (Abstract) बातें समझने लगता है और उच्च स्तर का तर्क करता है।
प्रमुख विशेषताएँ
1. अमूर्त चिंतन (Abstract Thinking)
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किशोर न्याय, स्वतंत्रता, राष्ट्र, ईमानदारी जैसे विचार समझता है।
2. कल्पना + तर्क का विकास
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भविष्य की योजना बनाना, लक्ष्य तय करना शुरू करता है।
3. परिकल्पना निर्माण (Hypothetical Thinking)
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“अगर ऐसा हुआ तो क्या होगा?” जैसी सोच विकसित होती है।
4. वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Reasoning)
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प्रयोग, निष्कर्ष, प्रमाण आधारित सोच बढ़ती है।
5. आत्मचिंतन (Metacognition)
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किशोर अपने सोचने के तरीके पर भी सोचने लगता है।
6. निर्णय क्षमता (Decision Making)
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अच्छे-बुरे में अंतर करके निर्णय लेने लगता है।
शिक्षणात्मक महत्त्व
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शिक्षक को वाद-विवाद, चर्चा, केस स्टडी, प्रोजेक्ट, प्रयोग कराना चाहिए।
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किशोरों में सोचने की शक्ति बढ़ती है, इसलिए रटंत शिक्षा की जगह समझ आधारित शिक्षण होना चाहिए।
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उन्हें मार्गदर्शन, प्रेरणा और सकारात्मक वातावरण देना चाहिए।
5) युवावस्था (18+ वर्ष) में संज्ञानात्मक विकास
युवावस्था में संज्ञानात्मक क्षमताएँ अधिक परिपक्व हो जाती हैं। व्यक्ति ज्ञान को वास्तविक जीवन में उपयोग करना सीखता है।
प्रमुख विशेषताएँ
1. उच्च स्तर की समझ और विश्लेषण
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व्यक्ति जटिल समस्याओं का समाधान सोच-समझकर करता है।
2. अनुभव आधारित सीखना
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व्यक्ति अनुभव से सीखता है और निर्णय बेहतर बनते हैं।
3. रचनात्मकता और नवाचार
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नए विचार, नई योजनाएँ बनाने की क्षमता बढ़ती है।
शिक्षणात्मक महत्त्व
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उच्च शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा और कौशल विकास में यह अवस्था अत्यंत उपयोगी है।
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शोध, परियोजना, प्रशिक्षण, प्रेजेंटेशन जैसी गतिविधियाँ आवश्यक हैं।
संज्ञानात्मक विकास को प्रभावित करने वाले कारक
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वंशानुक्रम (Heredity)
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पर्यावरण और अनुभव
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परिवार का सहयोग और बातचीत
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विद्यालय, शिक्षक की भूमिका
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पोषण और स्वास्थ्य
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प्रेरणा और अभ्यास
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सामाजिक एवं सांस्कृतिक वातावरण
निष्कर्ष / उपसंहार
इस प्रकार स्पष्ट है कि बालक का संज्ञानात्मक विकास जन्म से लेकर युवावस्था तक निरन्तर चलता रहता है। शैशवावस्था में बच्चा इन्द्रियों और क्रिया से सीखता है, बाल्यावस्था में प्रतीकात्मक सोच और कल्पना विकसित होती है, विद्यालयी अवस्था में ठोस तर्क और संरक्षण का विकास होता है तथा किशोरावस्था में अमूर्त चिंतन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और निर्णय क्षमता विकसित होती है।
अतः शिक्षक के लिए आवश्यक है कि वह बालकों की विकासात्मक अवस्था को समझकर ही शिक्षण विधि, गतिविधियाँ तथा पाठ्यवस्तु का चयन करे, ताकि सीखना अधिक प्रभावी और स्थायी बन सके।
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