भूमिका / प्रस्तावना
मानव जीवन एक निरन्तर विकास प्रक्रिया है। जन्म से लेकर प्रौढ़ावस्था तक मनुष्य में शारीरिक, मानसिक, संज्ञानात्मक, सामाजिक, भावनात्मक तथा नैतिक परिवर्तन होते रहते हैं। इन परिवर्तनों को ही विकास (Development) कहा जाता है। विकास केवल शरीर की वृद्धि नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के व्यवहार, सोच, समझ, रुचि, क्षमता, भावनाओं तथा व्यक्तित्व में होने वाले परिवर्तन का समग्र रूप है।
शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को प्रभावी बनाने के लिए शिक्षक को यह जानना आवश्यक है कि विभिन्न आयु वर्गों में बालक की ज़रूरतें, क्षमताएँ, रुचियाँ, सीखने का तरीका और व्यवहार अलग-अलग होते हैं। इसलिए विकास की विविध अवस्थाओं का ज्ञान शिक्षक के लिए अत्यन्त उपयोगी एवं आवश्यक है।
विकास की प्रमुख अवस्थाएँ तथा उनका शिक्षणात्मक महत्त्व
मानव विकास को सामान्यतः निम्न अवस्थाओं में बाँटा जाता है—
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शैशवावस्था (0–2 वर्ष)
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प्रारम्भिक बाल्यावस्था (2–6 वर्ष)
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उत्तर बाल्यावस्था (6–12 वर्ष)
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किशोरावस्था (12–18 वर्ष)
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युवावस्था / प्रौढ़ावस्था (18 वर्ष के बाद)
1) शैशवावस्था (0–2 वर्ष) का शिक्षणात्मक महत्त्व
शैशवावस्था विकास की प्रारम्भिक अवस्था है, जिसमें बच्चा अत्यन्त तेजी से वृद्धि करता है। इस अवस्था में सीखना मुख्यतः इन्द्रियों तथा क्रिया (Sensory-Motor) के माध्यम से होता है। बच्चा स्पर्श, स्वाद, ध्वनि और दृश्य अनुभवों से धीरे-धीरे अपने वातावरण को पहचानना शुरू करता है।
इस अवस्था में शिक्षणात्मक महत्त्व
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सुरक्षा और देखभाल सबसे अधिक आवश्यक होती है, क्योंकि इस समय बच्चे का भावनात्मक विकास (Emotional Development) तेज होता है।
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बच्चा माता-पिता/देखभालकर्ता पर निर्भर रहता है, इसलिए प्रेम और अपनापन मिलने से उसमें विश्वास (Trust) विकसित होता है।
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इस अवस्था में भाषा की शुरुआत होती है, अतः बातचीत, ध्वनि, संगीत, लोरी आदि से भाषा विकास को बढ़ावा मिलता है।
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बच्चे की आदतें (खाना, सोना, स्वच्छता) इसी समय बनती हैं, इसलिए सही आदतों का विकास किया जा सकता है।
2) प्रारम्भिक बाल्यावस्था (2–6 वर्ष) का शिक्षणात्मक महत्त्व
यह अवस्था पूर्व-प्राथमिक शिक्षा (ECCE) की सबसे महत्वपूर्ण अवस्था है। इस समय बच्चे में कल्पना, जिज्ञासा, अनुकरण तथा भाषा का विकास तेजी से होता है। बच्चा “कैसे?” और “क्यों?” जैसे प्रश्न अधिक पूछता है।
इस अवस्था में शिक्षणात्मक महत्त्व
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बच्चा सबसे अधिक खेल (Play-way method) से सीखता है।
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कहानी, कविता, गीत, चित्रों द्वारा सिखाने पर बच्चा जल्दी समझता है।
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ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम होती है, इसलिए छोटे-छोटे रोचक गतिविधियाँ आवश्यक होती हैं।
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सामाजिक विकास प्रारम्भ होता है—बच्चा समूह में खेलना, बाँटना और नियम मानना सीखता है।
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इस समय बच्चे में भाषा के शब्द भंडार (Vocabulary) का बहुत विकास होता है।
3) उत्तर बाल्यावस्था / विद्यालयी अवस्था (6–12 वर्ष) का शिक्षणात्मक महत्त्व
यह अवस्था प्राथमिक स्तर की शिक्षा की मुख्य अवस्था है। इसी आयु में बालक विद्यालय की औपचारिक शिक्षा में प्रवेश करता है। इस समय बालक में पढ़ने-लिखने, गणना करने, नियम सीखने तथा अनुशासन पालन करने की क्षमता तेजी से विकसित होती है।
इस अवस्था में शिक्षणात्मक महत्त्व
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यह आधारभूत साक्षरता और संख्यात्मकता (Foundational Literacy & Numeracy) मजबूत करने का समय है।
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बच्चा ठोस वस्तुओं (Concrete objects) से सीखना पसंद करता है, इसलिए उदाहरण और सामग्री की मदद से पढ़ाना उपयोगी होता है।
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इस अवस्था में बच्चों में स्मरण शक्ति, अभ्यास की आदत तथा परिश्रम विकसित किया जा सकता है।
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बच्चे मित्र समूह में जुड़ते हैं; सहयोग, प्रतिस्पर्धा और नेतृत्व के गुण विकसित होते हैं।
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शिक्षक के प्रति सम्मान और अनुकरण की भावना रहती है, इसलिए शिक्षक का व्यवहार बच्चे पर गहरा प्रभाव डालता है।
4) किशोरावस्था (12–18 वर्ष) का शिक्षणात्मक महत्त्व
किशोरावस्था को “संक्रमण काल” भी कहा जाता है क्योंकि यह बाल्यावस्था से प्रौढ़ावस्था की ओर जाने का चरण है। इस अवस्था में तीव्र शारीरिक परिवर्तन, भावनात्मक अस्थिरता तथा स्वतंत्रता की भावना अधिक होती है।
इस अवस्था में शिक्षणात्मक महत्त्व
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किशोर तर्क और चिंतन करने लगता है, इसलिए विचार-विमर्श, समस्या समाधान, तार्किक प्रश्न उपयोगी होते हैं।
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आत्मसम्मान की भावना बढ़ती है; आलोचना से वह जल्दी आहत हो सकता है, अतः शिक्षक को संवेदनशील एवं सहयोगी होना चाहिए।
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यह अवस्था व्यक्तित्व निर्माण और करियर चयन की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
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अनुशासन बलपूर्वक नहीं, बल्कि मित्रवत मार्गदर्शन एवं कारण बताकर लागू करना चाहिए।
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मूल्य शिक्षा, नैतिक शिक्षा, जीवन कौशल (Life Skills) और सामाजिक जिम्मेदारी सिखाने का अच्छा अवसर होता है।
5) युवावस्था / प्रौढ़ावस्था (18+ वर्ष) का शिक्षणात्मक महत्त्व
यह अवस्था परिपक्वता की अवस्था है। इस समय व्यक्ति लक्ष्य के प्रति गंभीर होता है और अपने अनुभवों के आधार पर निर्णय लेने लगता है। सीखने की शैली स्व-निर्देशित (Self-directed learning) हो जाती है।
इस अवस्था में शिक्षणात्मक महत्त्व
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व्यक्ति अपनी रुचि के अनुसार विषय चुनता है, इसलिए शिक्षण को व्यावहारिक और उद्देश्यपूर्ण बनाना आवश्यक है।
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कौशल विकास (Skill Development), उच्च शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा में यह अवस्था अत्यधिक महत्वपूर्ण है।
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अनुसंधान, नवाचार तथा समस्या समाधान के माध्यम से सीखना प्रभावी होता है।
विकास की अवस्थाओं के ज्ञान का शिक्षक के लिए समग्र महत्त्व
विकास की अवस्थाओं को समझकर शिक्षक—
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बच्चों की रुचि, योग्यता और जरूरत पहचान सकता है।
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आयु के अनुसार उचित शिक्षण विधि चुन सकता है।
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पाठ्यक्रम को बच्चों की क्षमता के अनुसार सरल और रोचक बना सकता है।
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बच्चों की समस्याओं (डर, तनाव, सीखने में कठिनाई) को समझकर समाधान कर सकता है।
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उचित मूल्यांकन (Evaluation) कर सकता है।
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सकारात्मक वातावरण बनाकर बच्चों में आत्मविश्वास और प्रेरणा बढ़ा सकता है।
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कक्षा प्रबंधन और अनुशासन को मानवीय और प्रभावी तरीके से लागू कर सकता है।
उपसंहार / निष्कर्ष
अतः यह स्पष्ट है कि विकास की विविध अवस्थाओं का ज्ञान शिक्षा की सफलता की कुंजी है। प्रत्येक अवस्था की अपनी विशेषताएँ और आवश्यकताएँ होती हैं। यदि शिक्षक बालकों की विकासात्मक अवस्था के अनुरूप शिक्षण योजनाएँ बनाता है, तो शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया अधिक प्रभावी, रुचिकर, व्यवहारिक और स्थायी बन जाती है। इसी कारण विकासात्मक मनोविज्ञान का अध्ययन शिक्षक के लिए अत्यन्त आवश्यक माना गया है।
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